MP Board Traimasik pariksha 12th Economics Paper Solution | मध्य प्रदेश बोर्ड 12th अर्थशास्त्र त्रैमासिक पेपर सलूशन

हाल ही में मध्य प्रदेश बोर्ड ने वर्ष 2021-22 के लिए छात्रों के त्रैमासिक परीक्षा के लिए निर्देश जारी किये है . बोर्ड के अनुसार सभी बच्चों के त्रैमासिक एग्जाम 24 सितम्बर से शुरू होंगे जिसमे एक प्रश्न पत्र होगा और उसके सभी प्रश्नों का हल करना अनिवार्य होगा . सभी विद्यार्थियों को कक्षा 9 से 12 तक सभी विद्यार्थियों को अपनी कक्षा से सम्बंधित पाठ्यक्रम ( syllabus ) का पता होना बेहद ज्यादा जरूरी है .

MP Board Traimasik pariksha 12th Economics Paper Solution | मध्य प्रदेश बोर्ड 12th अर्थशास्त्र त्रैमासिक पेपर सलूशन

नीचे विषयवार सभी महत्वपूर्ण प्रश्नों को आपको दिया गया है . आप इन प्रश्नों को तैयार करके जरूर जाना क्योंकि यह प्रश्न बेहद महत्वपूर्ण है जिसके साथ आप अपने त्रैमासिक एग्जाम को और भी अच्छी तरह से एटेम्पट कर पाओगे .

त्रैमासिक परीक्षा महत्वपूर्ण प्रश्न 

3 jun 1

 अर्थशास्त्र
Important questions with solution

PART – A
व्यष्टि अर्थशास्त्र एक परिचय

Chapter – 1
परिचय (introduction)

प्रश्न 1. व्यष्टि अर्थशास्त्र की कोई एक परिभाषा लिखिए।

अथवा

व्यष्टि अर्थशास्त्र को व्यक्तिगत अर्थशास्त्र क्यों कहते हैं ?

उत्तर-. प्रो. बोल्डिंग के अनुसार, “व्यष्टि अर्थशास्त्र विशेष फर्मों, विशेष परिवारों, वैयक्तिक कीमतों,मजदूरियों, आयों, वैयक्तिक उद्योगों तथा विशिष्ट वस्तुओं का अध्ययन करता है।” अर्थात् व्यष्टिगत अर्थशास्त्र अर्थव्यवस्था के ‘भागों’ से सम्बन्धित है। यह अर्थव्यवस्था की व्यक्तिगत इकाइयों का अध्ययन करता है।इसलिए व्यष्टि अर्थशास्त्र को व्यक्तिगत अर्थशास्त्र कहते हैं।

प्रश्न 2. “व्यष्टि अर्थशास्त्र का मुख्य यन्त्र कीमत सिद्धान्त है।” स्पष्ट कीजिए।

उत्तर-. व्यष्टि अर्थशास्त्र का मुख्य विषय यह है कि किसी वस्तु-विशेष की कीमत या उत्पादन के किसी साधन की कीमत कैसे निर्धारित होती है। यही कारण है कि व्यष्टि अर्थशास्त्र को कीमत सिद्धान्त भी कहते हैं। प्रो. शुल्ज के अनुसार, “व्यष्टि अर्थशास्त्र का मुख्य यन्त्र कीमत सिद्धान्त है।”

प्रश्न 3. अर्थव्यवस्था से क्या आशय है ?

उत्तर-. अर्थव्यवस्था वह प्रणाली है जिसके अन्तर्गत आर्थिक क्रियाओं का संचालन होता है। अर्थव्यवस्था एक ऐसी प्रणाली है जिसमें मानव अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए साधनों के सही शोषण एवं व्यवहार की व्यवस्था करता है। प्रो. ए. जे. ब्राउन के अनुसार, “अर्थव्यवस्था से आशय एक ऐसी प्रणाली से है, जिसके द्वारा लोग जीविका प्राप्त करते हैं।”

प्रश्न 4. “व्यष्टि तथा समष्टि अर्थशास्त्र एक-दूसरे के पूरक हैं।” इस कथन को स्पष्ट कीजिए।

अथवा

सूक्ष्म एवं व्यापक अर्थशास्त्र की अन्त:निर्भरता को बताइए।

उत्तर- यद्यपि व्यष्टि अर्थशास्त्र एवं समष्टि अर्थशास्त्र, अर्थशास्त्र के अध्ययन की दो भिन्न-भिन्न शाखाएँ हैं। उनका क्षेत्र भी अलग-अलग है। व्यष्टि अर्थशास्त्र के अन्तर्गत जहाँ कीमतें अत्यन्त महत्त्वपूर्ण स्थान रखती हैं, वहीं समष्टि अर्थशास्त्र में आय की धारणा महत्त्वपूर्ण समझी जाती है। फिर भी ये दोनों एक-दूसरे के प्रतियोगी न होकर परस्पर पूरक एवं सहयोगी हैं। दोनों में परस्पर घनिष्ठ सम्बन्ध है। दोनों एक-दूसरे की सीमाओं व विश्लेषण सम्बन्धी कठिनाइयों का समाधान करती हैं। दोनों का ही विकास एक-दूसरे पर निर्भर करता है।

प्रो. गार्डनर एकले के शब्दों में, “यद्यपि समष्टि अर्थशास्त्र तथा व्यष्टि अर्थशास्त्र के बीच कोई सुनिश्चित रेखा नहीं खींची जा सकती तथापि ठोस निष्कर्षों पर पहुँचने के बाद व्यष्टिगत समस्याओं का हल समष्टिगत उपकरणों की सहायता से तथा समष्टिगत समस्याओं का हल व्यष्टिगत उपकरणों की सहायता से निकाला जाना चाहिए।

प्रो. सेम्युलसन के अनुसार, “वास्तव में सूक्ष्म और व्यापक अर्थशास्त्र में कोई विरोध नहीं है, दोनों अत्यन्त आवश्यक हैं, यदि आप एक को समझते हैं और दूसरे से अनभिज्ञ रहते हैं, तो आप केवल अर्द्ध-शिक्षित हैं।”

प्रश्न 5. आदर्शक आर्थिक विश्लेषण से आपका क्या अभिप्राय है ?

उत्तर-. आदर्शक आर्थिक विश्लेषण-आदर्शक आर्थिक विश्लेषण में हम यह समझने का प्रयास करते है कि ये विधियाँ हमारे अनुकूल है भी या नहीं। यह अर्थव्यवस्था के प्रदर्शन में सुधार करने के लिए नीतियों को समाहित करती हैं। इसका सम्बन्ध मुख्य रूप से आदर्शों से होता है। उदाहरण के लिए, जब हम कहते हैं कि सिगरेट और शराब की माँग कम करने के लिए उनके ऊपर कर की दरें बढ़ा देनी चाहिए तो यह आदर्शक आर्थिक विश्लेषण है।

प्रो. जे. एम. कीन्स के अनुसार, “एक आदर्शक आर्थिक विश्लेषण या एक नियमकारी विज्ञान, क्रमबद्ध ज्ञान का वह रूप है जिसका, ‘क्या होना चाहिए’ के सिद्धान्त से सम्बन्ध है। वह विज्ञान वास्तविकता के स्थान आर्थिक विश्लेषण का मुख्य उद्देश्य लक्ष्यों का निर्धारण करना है। उदाहरण के लिए, एक आदर्शक आर्थिक पर आदर्श से सम्बन्धित है। आदर्शक आर्थिक विश्लेषण का उद्देश्य आदर्शों को निर्धारित करना है।” आदर्शक विश्लेषण के रूप में अर्थशास्त्र कई प्रकार के सुझाव देगा; जैसे-देश का आर्थिक विकास होना चाहिए, कीमतों में स्थिरता पाई जानी चाहिए, पूर्ण रोजगार होना चाहिए, आय का समान वितरण होना चाहिए। अर्थशास्त्र का सम्बन्ध केवल तथ्यों के अध्ययन करने से नहीं है बल्कि आर्थिक लक्ष्यों को निर्धारित करने से भी है।

व्यष्टि अर्थशास्त्र

1. व्यष्टि अर्थशास्त्र अर्थव्यवस्था के एक छोटे अंश: का अध्ययन करता है। जबकि समष्टि अर्थशास्त्र  संपूर्ण आर्थिक प्रणाली का अध्ययन करता है।

2. व्यष्टि अर्थशास्त्र में वस्तुओं की कीमत, उत्पादन के साधनों की कीमत आदि का अध्ययन किया जाता है। जबकि समष्टि अर्थशास्त्र में कुल रोजगार कुल निवेश राष्ट्रीय आय कुल उत्पादन आदि का अध्ययन किया जाता है।

3. व्यष्टि अर्थशास्त्र में योग को टुकड़ों में विभाजित करने की क्रिया सम्पन्न होती है। जबकि समष्टिगत अर्थशास्त्र का आधार योग करने की क्रिया है।

4. सूक्ष्म अर्थशास्त्र का प्रमुख विषय ‘कीमत सिद्धान्त’ का विश्लेषण करना है। जबकि समष्टि अर्थशास्त्र का प्रमुख विषय राष्ट्रीय आय व रोजगार का विश्लेषण करना है।

5. व्यष्टि अर्थशास्त्र व्यक्तिगत फर्मों, उद्योगों व उत्पादन की इकाइयों में उतार-चढ़ाव की व्याख्या करता है। जबकि समझती अर्थशास्त्र संपूर्ण अर्थव्यवस्था के उतार-चढ़ाव आर्थिक मंदी अवसाद या आर्थिक तेजी की व्याख्या करता है।

प्रश्न 6. केन्द्रीकृत योजनाबद्ध अर्थव्यवस्था तथा बाजार अर्थव्यवस्था के भेद को स्पष्ट कीजिए।

उत्तर-. केन्द्रीकृत योजनाबद्ध अर्थव्यवस्था-केन्द्रीकृत योजनाबद्ध अर्थव्यवस्था के अन्तर्गत सरकार उस अर्थव्यवस्था के सभी महत्वपूर्ण क्रियाकलापों की योजना बनाती है। वस्तुओं व सेवाओं के उत्पादन, विनिमय तथा उपभोग से सम्बद्ध सभी महत्त्वपूर्ण निर्णय सरकार द्वारा किये जाते हैं। वह केन्द्रीय सत्ता संसाधनों का विशेष रूप से विनिधान करके वस्तुओं एवं सेवाओं का अन्तिम संयोग प्राप्त करने का प्रयास कर सकती है, जो पूरे समाज के लिए उपयुक्त हो। उदाहरण के लिए, यदि यह पाया जाता है कि कोई ऐसी वस्तु अथवा सेवा जो पूरी अर्थव्यवस्था की सुख-समृद्धि के लिए अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है; जैसे-शिक्षा या स्वास्थ्य सेवा, जिसका व्यक्तियों द्वारा स्वयं पर्याप्त मात्रा में उत्पादित नहीं किया जा रहा हो, तो सरकार उन्हें ऐसी वस्तुओं तथा सेवाओं का उपयुक्त मात्रा में उत्पादन करने के लिए प्रेरित कर सकती है या फिर सरकार स्वयं ऐसी वस्तुओं तथा सेवाओं का उत्पादन करने का निर्णय कर सकती है।

बाजार अर्थव्यवस्था – केन्द्रीकृत योजनाबद्ध अर्थव्यवस्था के विपरीत बाजार अर्थव्यवस्था में सभी आर्थिक क्रियाकलापों का निर्धारण बाजार की स्थितियों के अनुसार होता है। अर्थशास्त्र के अनुसार, बाजार एक ऐसी संस्था है जो अपने आर्थिक क्रियाकलापों का अनुसरण करने वाले व्यक्तियों को निर्बाध अन्तःक्रिया प्रदान करती है। बाजार का स्पष्ट लक्षण वह व्यवस्था है जिसमें लोग निर्बाध रूप से वस्तुओं को क्रय और विक्रय करने का कार्य कर सकते हैं।

बाजार व्यवस्था में प्रत्येक वस्तु तथा सेवा की एक निर्धारित कीमत होती है। क्रेताओं तथा विक्रेताओं का परस्पर इसी कीमत पर विनिमय होता है। साधारणत: समाज किसी वस्तु या सेवा का जैसा मूल्यांकन करता है, कीमत उसी मूल्यांकन पर निर्धारित होती है। यदि क्रेता किसी वस्तु की अधिक मात्रा की माँग करते हैं, तो उस वस्तु की कीमत में वृद्धि हो जाती हैं। इस प्रकार, वस्तुओं तथा सेवाओं की कीमतें बाजार में सभी व्यक्तियों को महत्त्वपूर्ण संकेत प्रदान करती हैं जिससे बाजार तन्त्र में समन्वय स्थापित होता है। अत: बाजार अर्थव्यवस्था में उन केन्द्रीय समस्याओं का समाधान किस वस्तु का और किस मात्रा में उत्पादन किया जाना है, कीमत के इन्हीं संकेतों के द्वारा आर्थिक क्रियाकलापों के समन्वय से होता है।

प्रश्न 7. व्यापक अर्थशास्त्र के महत्त्व को स्पष्ट कीजिए।

उत्तर- सन् 1929 की विश्वव्यापी मन्दी के बाद से समष्टि आर्थिक विश्लेषण का महत्त्व सैद्धान्तिक व व्यावहारिक दृष्टि से अत्यधिक बढ़ गया है। इसके महत्त्व व उपयोग को प्रतिपादित करते हुए प्रो. बोल्डिंग ने स्पष्ट किया है कि अर्थशास्त्र की नीतियाँ और सम्बन्ध किसी व्यक्ति विशेष एवं वस्तु विशेष से न होकर समूहों से होता है। इसके महत्त्व को निम्नलिखित शीर्षकों के अन्तर्गत समझा जा सकता है-

(1) अर्थशास्त्र की कार्य प्रणाली को समझने में सहायक-अर्थव्यवस्था की क्रियाशीलता को समझने के लिए समष्टिगत आर्थिक चरों का अध्ययन आवश्यक होता है, क्योंकि व्यष्टिगत आर्थिक चर आर्थिक प्रणाली के छोटे-छोटे अंगों का व्यवहार चित्रित करते हैं, परन्तु अधिकांश देशों की समस्याएँ कुल उत्पादन, कुल रोजगार, सामान्य मूल्य स्तर तथा भुगतान सन्तुलन से सम्बन्धित होती हैं जिनकी कार्य-प्रणाली को समष्टि आर्थिक विश्लेषण के अभाव में समझना असम्भव है।

(2) सूक्ष्म अर्थशास्त्र के विकास में सहायक– अधिकांशत: बहुत कम सूक्ष्मभावी समस्याएँ ऐसी होती हैं जिनका समष्टिगत पहलू नहीं होता। अत: व्यक्तिगत समस्याओं के विश्लेषण हेतु वृहत् अर्थशास्त्र का अध्ययन करना अनिवार्य है; जैसे-किसी विशेष उद्योग (इस्पात) में मजदूरी का निर्धारण अर्थव्यवस्था में प्रचलित सामान्य मजदूरी स्तर से ही प्रभावित होता है। इस प्रकार वृहत् आर्थिक विश्लेषण की सहायता से ही सूक्ष्म अर्थशास्त्र का विकास सम्भव है।

(3) आर्थिक नीति के निर्धारण में सहायक-आजकल सरकार सभी प्रकार की अर्थव्यवस्था में उपयुक्त नीतियाँ निर्धारित करने के लिए उपाय अपनाती है। सरकार द्वारा अपनायी गयी नीतियों का सम्बन्ध व्यक्तिगत इकाइयों से न होकर समूहगत इकाइयों से होता है।

(4) विकास नियोजन में सहायक-‘विकास नियोजन’ वर्तमान युग की सर्वाधिक उपयोगी पद्धति है। अल्प-विकसित देशों के आर्थिक पिछड़ेपन को दूर करने के लिए तो विकास नियोजन की अत्यधिक आवश्यकता है। समष्टिगत धारणाओं के आधार पर ही नियोजन अधिकारी देश के वर्तमान एवं सम्भाव्य साधनों के सम्बन्ध में महत्त्वपूर्ण तथ्य एकत्र करता है तथा उन साधनों का विभिन्न प्रयोगों के बीच वितरण करता है। विकास परियोजनाओं का मूल्यांकन भी समष्टिमूलक ही होता है।

(5) मौद्रिक समस्याओं का विश्लेषण- समष्टि अर्थशास्त्र की सहायता द्वारा मौद्रिक समस्याओं का विश्लेषण एवं उनका समाधान किया जा सकता है। अर्थव्यवस्था में मुद्रा के मूल्यों में होने वाले परिवर्तनों से समाज के विभिन्न वर्गों को बचाने के लिए उपयुक्त मौद्रिक एवं प्रशुल्क नीति अपनाना अति आवश्यक होता है। सरकार मौद्रिक नीति की प्रभावशीलता भी समष्टि विश्लेषण द्वारा ज्ञात कर सकती है।

(6) अनेक समस्याओं का समाधान समष्टिगत विश्लेषण द्वारा ही सम्भव-विदेशी विनिमय, राजस्व, बैंकिंग, मुद्रा आदि से सम्बन्धित अनेक समस्याओं का समाधान सूक्ष्म अर्थशास्त्र द्वारा ही सम्भव नहीं है। इन समस्याओं का समाधान वृहत् (समष्टि) अर्थशास्त्र द्वारा ही सम्भव है।

Chepter – 2

उपभोक्ता के व्यवहार का सिद्धांत

प्रश्न 1. उपयोगिता की परिभाषा दीजिए।

उत्तर- किसी वस्तु का वह गुण, शक्ति या क्षमता जिसके द्वारा किसी व्यक्ति की आवश्यकताओं की पूर्ति (सन्तुष्टि) होती है, उपयोगिता कहलाती है।

प्रश्न 2. उपयोगिता ह्रास नियम की परिभाषा बताइए।

उत्तर- प्रो. मार्शल के अनुसार, “किसी व्यक्ति को उसके पास किसी वस्तु की मात्रा में वृद्धि होने से जो अतिरिक्त लाभ प्राप्त होता है, वह उस वस्तु की माँग में होने वाली प्रत्येक वृद्धि के साथ घटता जाता है।”

प्रश्न 3. ह्रासमान सीमान्त तुष्टिगुण नियम का कथन लिखिए।

उत्तर- “यदि अन्य बातें स्थिर रहें तो जैसे-जैसे उपभोग की जाने वाली वस्तु की अगली इकाइयों का उपभोग किया जाता है, अगली इकाइयों की उपयोगिता क्रमश: घटती जाती है।”

प्रश्न 4. उपभोक्ता सन्तुलन से आप क्या समझते हैं ?

उत्तर- उपभोक्ता, सन्तुलन की स्थिति में तब माना जाता है जब उसको अपनी आय से अधिकतम सन्तुष्टि प्राप्त हो रही हो। उपभोक्ता सन्तुलन से आशय इस बात की जानकारी करना है कि उपभोक्ता अपनी आय से अधिकतम सन्तुष्टि कैसे प्राप्त करता है।

प्रश्न 5. उपभोक्ता के बजट सेट से आप क्या समझते हैं ?

अथवा

उपभोक्ता बजट को समझाइए।

उत्तर– बजट सेट का आशय-बजट सेट उन वस्तुओं के सभी बण्डलों का संग्रह है, जिन्हें उपभोक्ता प्रचलित बाजार कीमत पर अपनी आय से खरीद सकता है।

प्रश्न 6. तटस्थता वक्र से क्या आशय है?

अथवा

अनधिमान वक्र की परिभाषा दीजिए।

उत्तर- तटस्थता वक्र वह रेखा है जिस पर स्थित प्रत्येक बिन्दु दो वस्तुओं के ऐसे संयोगों को प्रदर्शित करता है जिनसे एक उपभोक्ता को समान सन्तुष्टि की प्राप्ति होती है अर्थात् वह इनमें से किसी एक संयोग का चुनाव अपने उपभोग के लिए कर सकता है, किन्तु वह ऐसे संयोग का चुनाव करेगा जो उसके लिए मितव्ययी हो।

प्रश्न 7. माँग का क्या अर्थ है ?

उत्तर- माँग का आशय एक दी हुई वस्तु की उन विभिन्न मात्राओं से होता है जिन्हें उपभोक्ता एक बाजार में किसी दिये हुए समय में विभिन्न मूल्यों पर क्रय करते हैं। वस्तु के लिए केवल इच्छा होना ही वस्तु की माँग नहीं कहलाती अपितु उस इच्छा की पूर्ति के लिए व्यक्तियों के पास साधन भी होने चाहिए।

प्रश्न 8. माँग और आवश्यकता में कोई तीन अन्तर लिखिये।

अथवा

माँग के आवश्यक तत्व लिखिए।

उत्तर-  सामान्य रूप से मांग और आवश्यकता में अंतर नहीं मालूम पड़ता है परंतु आर्थिक दृष्टिकोण से उनमें थोड़ा अन्तर है। आवश्यकता प्रभावपूर्ण इच्छा को कहते हैं। इसमें तीन मुख्य बातें होनी चाहिए-

(1) वस्तु की इच्छा, (2) इच्छा को पूरा करने के लिए साधन, तथा (3) साधन को व्यय करने की तत्परता,

परन्तु माँग को प्रभावपूर्ण इच्छा कहना त्रुटिपूर्ण है, क्योंकि माँग के लिए दो अन्य बातें भी होनी चाहिए-

(1) निश्चित कीमत, (2) निश्चित समयावधि। अत: माँग में पाँचों बातों का होना आवश्यक है।

प्रश्न 9. सामान्य वस्तु से आप क्या समझते हैं ?

उत्तर– जब उपभोक्ता की आय में वृद्धि होती है तो जिन वस्तुओं की मात्रा में वृद्धि होती है तथा जब उपभोक्ता की आय में कमी आती है तो जिन वस्तुओं की माँग में कमी आती है। ऐसी वस्तुएँ सामान्य वस्तुएँ कहलाती हैं।

प्रश्न 10. निम्नस्तरीय वस्तु को परिभाषित कीजिए। कुछ उदाहरण कीजिए। 

उत्तर- कुछ वस्तुएँ ऐसी होती हैं जिनके लिए माँग उपभोक्ता की आय के विपरीत दिशा में जाती है। ऐसी वस्तुओं को निम्नस्तरीय वस्तुएँ कहा जाता है। निम्नस्तरीय वस्तुओं के उदाहरण हैं; जैसे-निम्नस्तरीय खाद्य पदार्थ, मोटे अनाज।

प्रश्न 11. स्थानापन्न को परिभाषित कीजिए।  दो वस्तुओं के उदाहरण दीजिए।

उत्तर- जब किसी वस्तु का प्रयोग किसी वस्तु के अभाव (स्थान) में किया जाता है तो उसे स्थानापन्न वस्तुएँ कहते हैं; जैसे-चाय-कॉफी, गुड़-चीनी आदि।

प्रश्न 12. ‘गिफिन विरोधाभास’ से आप क्या समझते हैं ?

अथवा

माँग के नियम का एक अपवाद लिखिए।

उत्तर- माँग के नियम का सबसे महत्त्वपूर्ण अपवाद गिफिन का विरोधाभास माना जाता है। निम्न कोटि की वस्तुओं को गिफिन वस्तुएँ कहा जाता है; जैसे-देशी घी की तुलना में डालडा, गेहूँ की तुलना में बाजरा आदि इन वस्तुओं पर मांग का नियम लागू नहीं होता है अर्थात इन वस्तुओं की कीमत कम होने पर भी इनकी मांग में वृद्धि नहीं होती है।

प्रश्न 13. माँग में विस्तार और संकुचन का अर्थ बताइए।

उत्तर- जब कीमत में परिवर्तन के फलस्वरूप माँग में परिवर्तन होता है तो यह माँग का विस्तार और माँग का संकुचन कहलाता है। कीमत घटने पर माँग अधिक हो जाना माँग का विस्तार है और कीमत बढ़ने पर माँग का गिर जाना माँग का संकुचन है। माँग के विस्तार और संकुचन की अवस्था में व्यक्ति की वस्तु विशेष का माँग वक्र बदलता नहीं है।

प्रश्न 14. बजट रेखा की प्रवणता नीचे की ओर क्यों होती है ? समझाइए। 

उत्तर– बजट रेखा की प्रवणता नीचे की ओर होती है, क्योंकि बजट रेखा पर स्थित प्रत्येक बिन्दु एक ऐसे बण्डल को प्रदर्शित करता है जिस पर उपभोक्ता की पूरी आय व्यय हो जाती है, ऐसे में यदि उपभोक्ता वस्तु X की 1 इकाई अधिक लेना चाहता है, तब वह ऐसा तभी कर सकता है जब वह दूसरी वस्तु की छोड़ दे। वस्तु X की मात्रा कम किये बिना वह वस्तु Y की मात्रा बढ़ा नहीं सकता। वस्तु X की एक अतिरिक्त इकाई पाने के लिए उसे वस्तु Y की कितनी इकाई छोड़नी होगी यह दो वस्तुओं की कीमत पर निर्भर करेगा।

प्रश्न 15. बजट सेट तथा बजट लाइन में अन्तर स्पष्ट कीजिए।

उत्तर- बजट सेट तथा बजट लाइन में अन्तर-बजट सेट से आशय उन दो वस्तुओं के सम्भावित संयोजन के सेट से है, जिसका उपभोक्ता उपभोग करता है, जिसे वह अपनी आय और दी गई कीमत से वहन कर सकता है। जबकि बजट लाइन दो वस्तुओं के संयोजन के पूरे संग्रह की चित्रमय प्रस्तुति है जिसमें उपभोक्ता अपनी पूरी आय खर्च कर देता है। बजट लाइन तब परिवर्तित हो जाती है जब (i) उपभोक्ता की आय तथा (ii) उन दो वस्तुओं की कीमत में परिवर्तन हो जाए जिन्हें उपभोक्ता खरीदना चाहता है। बजट लाइन को कीमत रेखा या उपभोग सम्भावित रेखा भी कहते हैं।

प्रश्न16.   उदासीनता वक्र विश्लेषण का महत्व बताइए।

उत्तर- अधुनिक आर्थिक विश्लेषण में उदासीनता वक्र विश्लेषण का महत्त्वपूर्ण स्थान हो गया है। इनके महत्व एवं विभिन्न क्षेत्रों में प्रयोग निम्न प्रकार हैं-

(1) दो व्यक्तियों के मध्य विनिमय की सीमा ज्ञात करने के लिए– उदासीनता वक्रों को सहायता से दो व्यक्तियों के किन्हीं दो वस्तुओं के सम्बन्ध में अधिमान क्रम ज्ञात होने पर सहजतापूर्वक यह मालूम किया जा सकता है कि ये व्यक्ति आपस में वस्तुओं का विनिमय किस सीमा के भीतर करेंगे।

(2)  राशनिंग के क्षेत्र में- जब अनिवार्य वस्तुओं का देश में अभाव हो जाता है तो सरकार द्वारा उनकी राशनिंग कर दी जाती है। राशनिंग व्यवस्था का उपभोक्ता को सन्तुष्टि पर क्या प्रभाव पड़ता है इसे ज्ञात करने के लिए हम उदासीनता वक्र की तकनीक का प्रयोग करते हैं।

(3) करारोपण के क्षेत्र में– वित्तमंत्री को जहाँ तक सम्भव हो ऐसे कर नहीं लगाने चाहिए जिससे करदाता को सन्तुष्टि में अधिक कमी हो। करारोपण के सम्बन्ध में वित्तमन्त्री की नीति ऐसी होनी चाहिए जिससे करदाताओं का त्याग न्यूनतम हो, यह किस प्रकार सम्भव होगा इसे उदासीनता वक्रों की सहायता से जाना जा सकता है।

(4) श्रमिक के कार्य और अवकाश के बीच अधिमान क्रम दिखाने के लिए– श्रमिक आपने समय को कार्य अवकाश के मध्य किस प्रकार बाँटेगा, इसे स्पष्ट करने के लिए उदासीन वक्र तकनीक का प्रयोग किया जाता है।

(5) उपभोक्ता की बचत की माप करने के लिए- अनेक आधुनिक अर्थशास्त्रियों के अनुसार उपभोक्ता की बचत की माप सम्भव नहीं है, परन्तु हिक्स ने उदासीनता वक्र की तकनीक के द्वारा उपभोक्ता की बचत की माप कर सकना सम्भव बताया है।

प्रश्न 17. माँग के नियम की विशेषताएँ बताइए।

अथवा

माँग के नियम का महत्त्व समझाइए। कोई दो बिन्दुओं में।

उत्तर- माँग के नियम की विशेषताएँ (महत्त्व)-माँग के नियम की निम्नलिखित विशेषताएँ हैं-

(1) कीमत एवं माँग में विपरीत सम्बन्ध होता है।

(2) कीमत स्वतन्त्र एवं माँग आश्रित होती है।

(3) माँग का नियम एक गुणात्मक कथन है।

(4) माँग का नियम किसी निश्चित समय पर वस्तु या सेवा की कीमत और माँग में विपरीत सम्बन्धक स्पष्ट करता है।

प्रश्न 18. सीमान्त उपयोगिता विश्लेषण का महत्त्व लिखिए।

उत्तर-  सीमान्त उपयोगिता ह्रास नियम का महत्व

(1) उपभोक्ता की बचत में महत्त्व– उपभोक्ता की बचत की धारणा भी सीमान्त उपयोगिता ह्रास नियम पर आधारित है। इस नियम के अनुसार, वस्तुओं की कई इकाइयाँ खरीदने पर सीमान्त इकाई की उपयोगिता कीमत के बराबर हो जाती है। इस सीमान्त इकाई पर उपभोक्ता को कोई बचत प्राप्त नहीं होती, जबकि सीमान्त इकाई से पहले की सभी इकाइयों पर उपभोक्ता को बचत प्राप्त होती है।

(2) मूल्य सिद्धान्त में महत्त्व– यह नियम मूल्य सिद्धान्त के लिए दृढ़ स्तम्भ का कार्य करता है, क्योंकि यह नियम स्पष्ट करता है कि वस्तु की पूर्ति में वृद्धि होने पर मूल्य में क्यों कमी होती है; अतः यह नियम मूल्य निर्धारण में सहायक होता है।

(3) माँग के नियम का आधार- माँग का नियम भी इसी नियम पर आधारित है। जैसे-जैसे उपभोक्ता किसी वस्तु का उपभोग करता है, वैसे-वैसे उस वस्तु से मिलने वाली अतिरिक्त उपयोगिता घटते हुए क्रम में प्राप्त होती है। अत: प्रत्येक उपभोक्ता प्रथम वस्तु की अपेक्षा दूसरी वस्तु के लिए कम मूल्य देता है। यह बात भी माँग के नियम से स्पष्ट होती है।

(4) नये उत्पादन को प्रोत्साहन-  इस नियम का महत्त्व उत्पादन के क्षेत्र में भी है। किसी वस्तु की अधिक पूर्ति होने पर उपभोक्ता को उससे कम उपयोगिता मिलती है; अत: उसे ऐसी नई वस्तुओं की आवश्यकता होती है जिनसे उसे अधिक उपयोगिता प्राप्त हो; अत: अधिक लाभ प्राप्त करने के लिए उत्पादक को उत्पादन का स्वरूप बदलना पड़ता है जिससे नये उत्पादन को प्रोत्साहन मिलता है।

(5) कर प्रणाली का आधार– सरकार को करारोपण करते समय इस नियम का सहारा लेना पड़ता है। यह नियम बताता है कि वस्तु की मात्रा में वृद्धि के साथ-साथ उसकी उपयोगिता में कमी आ जाती है। यही बात मुद्रा के सम्बन्ध में सही है। मुद्रा की उपयोगिता एक धनी की अपेकक्षा निर्धन के लिये कम है। इसी आधार पर सरकार बनी लोगों पर प्रगतिशील करारोपण करती है।

(6) सम सीमान्त उपयोगिता नियम का आधार यी उपभोक्ता अपने सीमित सायना । अधिकतम सन्तुष्टि प्राप्त करना चाहते हैं। इस उद्देश्य की प्राप्ति हेतु सम सीमान्त उपयोमिता नियम का सहारा लिया जाता है। सम-सीमान्त उपयोगिता नियम की प्रमुख मान्यता उपयोगिता यस नियम है। उपभोक्ता अपने धन को इस प्रकार व्यय करता है कि प्रत्येक उस आवश्यकता पर पहले व्यय किया जाये जिससे उसे अन्य आवश्यकताभी की अपेक्षा अधिक सन्तुष्टि प्राप्त हो तथा कुल उपयोगिता भी सर्वाधिक हो। अत: यह स्पष्ट है कि इस नियम के आधार पर सम सीमान्त उपयोगिता हास नियम की व्याख्या की गई है।

निष्कर्ष– उपर्युक्त व्याख्या से स्पष्ट है कि उपयोगिता ह्यस नियम का क्षेत्र व्यापक है तथा इस सिद्धान्त का सैद्धान्तिक तथा व्यावहारिक दोनों रूप में विशेष महत्व है। अत: कैरनेक्रास के अनुसार, “यह नियम केवल रोटी, मक्खन, रेल यात्रा व व्यक्ति की हैट आदि वस्तुओं पर ही क्रियाशील नहीं होता, बल्कि अर्थशास्त्रियों के व्याख्यानों, राजनीतिजों के भाषणों तथा जासूसी कहानियों के अनेक संदिग्ध व्यक्तियों के सम्बन्ध में भी समान रूप से सत्य उतरता है।” उपयोगिता ह्रास नियम की आलोचना उपयोगिता हास नियम की कई आलोचनाएँ हुई हैं। कई बार तो यह कहा जाता है कि इसने उपयोगिता को मापनीय माना है जबकि वास्तविकता में उपयोगिता को प्रत्यक्ष रूप से मापा नहीं जा सकता। यह व्यक्ति की  रुचि, इच्छा एवं भावनाओं आदि अनेक बातों से प्रभावित होती है। अर्थशास्त्र का उद्देश्य इन सबका विश्लेषण करना होता है। यह नियम मानकर चलता है कि व्यक्ति की आवश्यकता विशेष को पूर्ण रूप से सन्तुष्ट किया जा सकता है, किन्तु यह सही नहीं है। व्यक्ति की विभिन्न आवश्यकताओं के होते हुए भी उसके साधन सीमित बन जाते हैं और इसलिए किसी भी आवश्यकता की पूर्ण सन्तुष्टि नहीं हो पाती। यह नियम उपभोक्ता की शारीरिक क्षमता को सीमित मानता है। इसके अनुसार उपभोक्ता प्रारम्भिक इकाइयों का उपभोग करने के बाद थक जाता है और इसलिए अगली इकाइयों के उपभोग से उसे उतनी सन्तुष्टि प्राप्त नहीं हो पाती।

प्रश्न 19.  माँग से आप क्या समझते हैं ? माँग को प्रभावित करने वाले पाँच घटकों का वर्णन कीजिए।

अथवा

माँग को प्रभावित करने वाले प्रमुख तत्व लिखिए।

अथवा

माँग की परिभाषा दीजिए। बाजार माँग को प्रभावित करने वाले कारक बताइए।

उत्तर-  माँग शब्द को विभिन्न अर्थशास्त्रियों ने अलग-अलग अर्थों में परिभाषित किया है। माँग की कुछ प्रमुख परिभाषाएँ निम्न प्रकार हैं-

प्रो. मिल के अनुसार, “माँग से हमारा आशय किसी वस्तु की उस मात्रा से है जो एक निश्चित मूल्य पर खरीदी जाती है। इस अर्थ में माँग सदा मूल्य से सम्बन्धित होती है।

प्रो. पेन्सन के अनुसार, “माँग में निम्नलिखित तीन बातें सम्मिलित होती हैं; यथा-

(1) किसी वस्तु को प्राप्त करने की इच्छा;

(2) उसे क्रय करने के साधन; और

(3) इन साधनों से वस्तु प्राप्त करने की तत्परता।”

प्रो. बेनहम के अनुसार, “किसी दिये हुए मूल्य पर वस्तु की माँग उस मात्रा को कहते हैं जो उस मूल्य पर एक निश्चित समय में क्रय की जाती है।”

उपर्युक्त परिभाषाओं के आधार पर कहा जा सकता है कि माँग का आशय एक दी हुई वस्तु की उन विभिन्न मात्राओं से है जो उपभोक्ता एक बाजार में किसी समय विशेष पर विभिन्न मूल्यों पर क्रय करता है।

माँग को प्रभावित या निर्धारित करने वाले तत्व

एक वस्तु की माँग को अनेक तत्व प्रभावित या निर्धारित करते हैं। इनमें प्रमुख निम्नलिखित हैं-

(1) वस्तु की कीमत– किसी वस्तु की माँग को प्रभावित करने वाला सबसे प्रमुख तत्व उसकी कीमत होती है। वस्तु की कीमत में परिवर्तन के फलस्वरूप उसकी माँग में भी परिवर्तन हो जाता है। प्रायः वस्तु की कीमत के घटने पर माँग बढ़ती है तथा कीमत के बढ़ने पर माँग घटती है।

(2) उपभोक्ता की आय- उपभोक्ता की आय भी किसी वस्तु की माँग को निर्धारित करने वाला महत्त्वपूर्ण निर्धारक तत्व है। किसी व्यक्ति की आय बढ़ जाने पर वह किसी वस्तु की अधिक मात्रा ऊँचे मूल्य पर क्रय कर लेगा, किन्तु आय कम होने पर वस्तु का मूल्य कम होने पर भी कम मात्रा में क्रय करेगा अर्थात् आय के बढ़ने पर माँग बढ़ जाती है और आय घटने पर माँग कम हो जाती है।

(3) धन का वितरण- यदि समाज में धन का वितरण असमान है तो ऐसी वस्तुओं की माँग अधिक होगी जो पूँजीपतियों द्वारा क्रय की जाती हैं। यदि धन का वितरण समान है, धनी और निर्धनों की आय में कम अन्तर है, तो माँग बढ़ेगी।

(4) जनसंख्या में परिवर्तन- जनसंख्या बढ़ने पर मूल्य में वृद्धि होने पर भी माँग अधिक हो जाती है अर्थात् अधिक जनसंख्या होने पर देश में वस्तुओं एवं सेवाओं की माँग अधिक होगी और कम जनसंख्या होने पर इनकी माँग कम होगी।

(5) ऋतु में परिवर्तन- जाड़े की ऋतु में बर्फ का मूल्य काफी कम हो जाने पर भी बर्फ की माँग नहीं होती, किन्तु इसके विपरीत गर्मी की ऋतु में बर्फ का मूल्य बढ़ जाने पर भी उसकी माँग में कमी नहीं आती। अतः ऋतु परिवर्तन का भी माँग पर प्रभाव पड़ता है।

(6) भविष्य में मूल्य वृद्धि की सम्भावना- मूल्य अपरिवर्तित होने पर भी यदि भविष्य में मूल्य वृद्धि की सम्भावना होती है, तो वर्तमान में ही वस्तु की माँग बढ़ने लगती है। इसी प्रकार, जब भविष्य में मूल्य घटने की सम्भावना होती है तो वर्तमान में मूल्यों के अपरिवर्तित रहने पर भी उनकी माँग में कमी होने लगती है।

प्रश्न20.  व्यक्तिगत मांग तथा बाजार मांग में अंतर स्पष्ट कीजिए।

उत्तर– व्यक्तिगत मांग तथा बाजार मांग में अंतर-

1. व्यक्तिगत माँग वह माँग है जो अन्य बातें समान  रहने पर किसी वस्तु की कीमत तथा व्यक्ति द्वारा  रखरीदी गई मात्रा के सम्बन्ध को व्यक्त करती है। बाजार मांग वह मांग है जो किसी वस्तु की कीमत तथा विभिन्न भिन्नता को व्यक्त करती है।

2. व्यक्तिगत माँग एक व्यक्ति की माँग होती है जबकि बाजार मांग बाजार में उपस्थित बहुत सारे व्यक्तियों की मांग होती है।

3. व्यक्तिगत माँग मूल्य तथा एक व्यक्ति द्वारा माँगी  गयी मात्रा में फलनात्मक सम्बन्ध को दर्शाती है। जबकि बाजार मांग मूल्य तथा विभिन्न व्यक्तियों द्वारा मांग की गई मात्रा में फ़लनात्मक संबंधों को दर्शाती हैं।

4. विभिन्न कीमतों पर एक व्यक्ति द्वारा माँगी जाने वाली मात्रा व्यक्तिगत माँग है। विभिन्न कीमतों पर अनेक व्यक्तियों द्वारा एक वस्तु की विभिन्न मात्राओं की मांग का जोड़ बाजार मांग है।

5. एक व्यक्ति व्यक्तिगत माँग को प्रभावित कर सकता है। जबकि एक व्यक्ति कभी भी बाजार मांग को प्रभावित नहीं कर सकता है।

प्रश्न 21. माँग की लोच का महत्त्व बताइए।

उत्तर- माँग की लोच का महत्त्व

माँग की लोच का महत्त्व निम्न विवरण से स्पष्ट है-

(1) मूल्य निर्धारण के सिद्धान्त में महत्त्व-‘ माँग की लोच’ का विचार विभिन्न प्रकार की बाजार स्थितियों; जैसे-पूर्ण प्रतियोगिता, एकाधिकार, एकाधिकृत प्रतियोगिता आदि वस्तु के मूल्य निर्धारण में सहायक होता है। माँग की लोच अधिक होने पर मूल्य नीचा रखा जाता है, क्योंकि मूल्य के ऊँचा होते ही वस्तु की माँग कम होने लगती है। इसके विपरीत बेलोचदार वस्तुओं का मूल्य ऊँचा रखा जाता है।

(2) वितरण के सिद्धान्त में महत्त्व- माँग की लोच का विचार उत्पादन के विभिन्न साधनों का पुरस्कार निर्धारित करने में सहायक होता है। उत्पादन उन साधनों को अधिक पुरस्कार देता है, जिनकी माँग बेलोच होती है तथा उन साधनों को कम पुरस्कार देता है जिनकी माँग उनके लिए लोचदार होती है।

(3) सरकार के लिए महत्त्व–  कर-निर्धारण में माँग की लोच की धारणा सरकार के लिए अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है। जिन वस्तुओं की माँग की लोच बेलोचदार होती है उन वस्तुओं पर कर की दर ऊँची रखी जाती है, क्योंकि ऊँची दर से कर लगाने से वस्तु की कीमत बढ़ जाने पर भी उस वस्तुओं की माँग पूर्ववत् रहती है। इसके विपरीत जिन वस्तुओं की माँग की लोच अधिक लोचदार होती है उन वस्तुओं पर कर की दर कम रखी जाती है, क्योंकि ऐसी वस्तुओं की माँग पर कीमत में परिवर्तन का प्रभाव भी अधिक होता है; अतः सरकार कर लगाते समय माँग की लोच का ध्यान रखती है।

(4) अन्तर्राष्ट्रीय व्यापार में महत्त्व- अन्तर्राष्ट्रीय व्यापार के अन्तर्गत एक देश में व्यापार का लाभ उस देश की व्यापार की शर्तों से निर्धारित होता है और व्यापार की शर्ते दोनों देशों के आयातों एवं निर्यातों की माँग एवं पूर्ति की लोच पर निर्भर करती है। यदि किसी देश के निर्यातों की माँग बेलोचदार है, तो उन्हें वह ऊँची कीमतों पर बेच सकेगा। इसी प्रकार, आयातों के लिए यदि उसकी माँग बेलोचदार है तो उसे ऊँची कीमतें देनी पड़ेंगी।

(5) यातायात उद्योग में महत्त्व– यातायात उद्योग में भाड़े की दरें निर्धारित करने में माँग की लोच सहायक होती है। जिन वस्तुओं की यातायात माँग बेलोच होती है। उनके भाड़े की दरें ऊँची रखी जा सकती हैं तथा जिनकी माँग लोचदार होती है उनकी दरें नीची रखनी पड़ती हैं।

Chapter – 3

उत्पादन तथा लागत

प्रश्न 1. उत्पादन फलन से आप क्या समझते हैं ?

उत्तर– उत्पादन फलन का अर्थ-उत्पादन फलन उत्पादन सम्भावनाओं की सूची है अर्थात् एक फर्म का उत्पादन फलन एक दिये हुए समय में तथा तकनीकी ज्ञान की दी हुई स्थिति में साधनों के सभी सम्भव संयोगों तथा प्रत्येक संयोग से सम्बन्धित उत्पादन के बीच सम्बन्ध को बताता है। दूसरे शब्दों में, उत्पादन फलन किसी फर्म के लिए उत्पत्ति के साधनों की भौतिक मात्राओं तथा उनके प्रयोग के परिणामस्वरूप प्राप्त उत्पादन की भौतिक मात्रा के बीच सम्बन्ध को बताता है।

प्रश्न 2. उत्पत्ति ह्रास नियम की परिभाषा लिखिए।

अथवा

ह्रासमान प्रतिफल नियम या परिवर्तनशील अनुपातों के नियम का अर्थ लिखिए।

उत्तर- प्रो. मार्शल के अनुसार, “यदि कृषि कला में किसी प्रकार का सुधार न हुआ हो तो भूमि पर उपयोग की गयी पूँजी और श्रम की मात्रा में वृद्धि होने पर सामान्यतया कुल उपज में अनुपात से कम वृद्धि होती है।”

प्रश्न 3. सीमान्त उत्पादन का क्या आशय है ?

उत्तर– साधन की एक अतिरिक्त इकाई के प्रयोग से कुल उत्पादन में जो वृद्धि होती है, उसे सीमान्त उत्पादन (Marginal Production) कहते हैं।

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प्रश्न 4. उत्पत्ति वृद्धि नियम को परिभाषित कीजिए।

उत्तर- “श्रम और पूँजी में वृद्धि सामान्यतया संगठन को अधिक श्रेष्ठ बना देती है जिससे फिर श्रम और पूँजी की कार्यक्षमता में वृद्धि हो जाती है।”

प्रश्न 5. उत्पत्ति समता नियम को परिभाषित कीजिए।

उत्तर-  प्रो. मार्शल के अनुसार, “जब किसी उद्योग में उत्पत्ति ह्यस नियम तथा उत्पत्ति वृद्धि नियम की परस्पर विरोधी प्रवृत्तियाँ समान शक्ति के साथ क्रियाशील होकर एक-दूसरे को सन्तुलित करती हैं, तब उस उद्योग में उत्पत्ति समता नियम लागू होता है।”

प्रश्न 6. पैमाने के प्रतिफल से आप क्या समझते हैं ?

उत्तर- पैमाने के प्रतिफल का अर्थ-यदि एक विशिष्ट पैमाना रेखा पर साधनों की मात्राओं को परिवर्तित किया जाता है तो उत्पादन में परिवर्तन होगा। साधनों में इस प्रकार के परिवर्तनों के परिणामस्वरूप उत्पादन की प्रक्रिया को पैमाने का प्रतिफल कहा जाता है।

प्रश्न 7. वास्तविक लागत से क्या तात्पर्य है?

उत्तर–  वास्तविक लागत-वास्तविक लागत से आशय किसी वस्तु या सेवा के उत्पादन या प्राप्त करने में किये गये वास्तविक व्ययों के जोड़ से होता है। उदाहरण के लिए, कच्चे माल के क्रय हेतु भुगतान की गयी राशि, श्रमिकों की मजदूरी, पूँजी पर ब्याज आदि वास्तविक लागत कहलाते हैं।

प्रश्न 8. कुल लागत किसे कहते हैं ?

उत्तर–  कुल लागत-किसी वस्तु के उत्पादन में होने वाले विभिन्न व्ययों के योग को कुल लागत कही हैं। दूसरे शब्दों में, किसी वस्तु की एक निश्चित मात्रा के अनुपात में जो विभिन्न खर्चे होते हैं, उसे कुल लागत कहते हैं। उत्पादन की मात्रा में वृद्धि के साथ-साथ कुल लागत में भी वृद्धि होती चली जाती है।

प्रश्न 9. फलन किसे कहते हैं ?

उत्तर- उत्पादन फंक्शन (या फलन) के अर्थ को समझने से पहले आवश्यक है कि हम यह जानकारी प्राप्त कर लें कि फंक्शन (Function) का क्या अर्थ है। ‘फंक्शन’ गणित का शब्द है। जब हम यह कहते हैं कि Y’फंक्शन’ है X का तो इसका अभिप्राय है कि Y निर्भर रहता है X पर अर्थात् जब X को मूल्य (Value) प्रदान करते हैं तो उससे सम्बन्धित Y के मूल्य को मालूम किया जा सकता है। Y तथा X के उपर्युक्त फंक्शन सम्बन्ध (Functional Relation) को संक्षेप में निम्न प्रकार से व्यक्त करते हैं-

Y  = f(x)

इसको हम इस प्रकार पढ़ते हैं ‘Y, X का फंक्शन है’ (अर्थात् Y निर्भर करता है X मूल्यों पर)।

प्रश्न 10. उत्पत्ति ह्रास नियम की मान्यताएँ बताइए।

अथवा

क्रमागत उत्पत्ति ह्रास नियम की सीमाओं का उल्लेख कीजिए। (कोई चार)

उत्तर-  उत्पत्ति ह्रास नियम की मान्यताएँ या सीमाएँ-यह नियम निम्नलिखित मान्यताओं पर आधारित है-

(1) कुछ साधन स्थिर तथा एक साधन परिवर्तनशील होता है।

(2) इसमें यह मान लिया जाता है कि उत्पादन के साधनों के मिलने के अनुपात में इच्छानुसार परिवर्तन सम्भव है।

(3) संगठन व उत्पादन विधि में कोई परिवर्तन नहीं होता।

(4) परिवर्तनशील साधन की सब इकाइयाँ एक जैसी (समरूप) होती हैं।

(5) नियम का सम्बन्ध वस्तु के मूल्य से न होकर भौतिक मात्रा से होता है।

प्रश्न 11. उत्पत्ति ह्रास नियम की क्रियाशीलता को किस प्रकार रोका जा सकता है?

उत्तर–  उत्पत्ति हास नियम की क्रियाशीलता को निम्न प्रकार से रोका जा सकता है-

(1) परिवर्तनशील साधनों का प्रयोग थोड़ा-थोड़ा एवं मन्द गति से करने पर यह नियम काफी समय तक लागू नहीं होता।

(2) कृषि-पद्धति में परिवर्तन एवं उन्नति से इस नियम के लागू होने के समय में परिवर्तन किया जा सकता है।

(3) उत्पादन-साधन के भौतिक मात्रा में परिवर्तन से इस नियम की क्रियाशीलता को प्रभावित किया जा सकता है।

(4) उत्पादन के कार्य में साधनों के अनुपात से यह नियम प्रभावित हो सकता है।

(5) परिवर्तनशील साधनों की इकाइयाँ यदि समान या एकरूप न हो तो इस नियम की क्रियाशीलता में अन्तर आता है।

(6) सामान्यतया’ सम्बन्धी परिस्थितियों में परिवर्तन से यह नियम प्रभावित होगा।

प्रश्न 12. पैमाने के घटते हुए प्रतिफल के नियम लागू होने के कारण बताइए।

उत्तर- “पैमाने के घटते हुए प्रतिफल” लागू होने के कारण-उत्पादन कार्य में पैमाने के घटते हुए प्रतिफल की प्रवृत्ति लागू होने के क्या कारण हैं, इस विषय में अर्थशास्त्रियों में सहमति नहीं है। कुछ अर्थशास्त्रियों के अनुसार एक साहसी, एक स्थिर और अविभाज्य साधन है, दीर्घकाल में यद्यपि समस्त साधनों में वृद्धि की जा सकती है, किन्तु साहसी की नहीं। साहसी व उसके निर्णय लेने की प्रक्रिया अविभाज्य है। इस कथन के अनुसार, “पैमाने के घटते हुए प्रतिफल” परिवर्तनशील अनुपातों के केवल एक विशिष्ट रूप ही हैं। “कुछ अन्य अर्थशास्त्रियों का कथन है कि पैमाने के घटते हुए प्रतिफल का मुख्य कारण प्रबन्धकीय कठिनाइयाँ हैं। जब उत्पादन का पैमाना बड़ा हो जाता है तो विभिन्न साधनों के समन्वय और नियन्त्रण में शिथिलता आने लगती है जिससे उत्पादन के साधनों में समानुपाती वृद्धि नहीं होती।”

प्रश्न 13.स्थिर एवं परिवर्तनशील लागत में अन्तर बताइए।

उत्तर- स्थिर एवं परिवर्तनशील लागत में निम्नलिखित अन्तर हैं-

(1) स्थिर लागत उत्पादन बन्द कर देने पर भी शून्य नहीं होती जबकि परिवर्तनशील लागत उत्पादन बन्द कर देने पर शून्य हो जाती है।

(2) स्थिर लागतों पर उत्पादन की मात्रा में हुए परिवर्तनों का कोई प्रभाव नहीं पड़ता जबकि परिवर्तनशील लागत उत्पादन की मात्रा में हुए परिवर्तनों से प्रभावित होती है।

(3) स्थिर लागत का सम्बन्ध स्थिर साधनों से होता है जबकि परिवर्तनशील लागत का सम्बन्ध परिवर्तनशील या अस्थिर साधनों से होता है।

(4) औसत स्थिर लागत उत्पादन में वृद्धि के साथ घटती जाती है जबकि औसत परिवर्तनशील लागत प्रारम्भ में घटती है और एक सीमा के पश्चात् बढ़ने लगती है।

प्रश्न 14. उत्पादन फलन की विशेषताएँ व प्रभावित करने वाले तत्व बताइए।

उत्तर-  उत्पादन फलन का स्वभाव अथवा विशेषताएँ इस प्रकार हैं-

(1) उत्पादन फलन एक इन्जीनियरिंग समस्या है आर्थिक समस्या नहीं-उत्पादन फलन का काम केवल उत्पादन के साधनों तथा उपज की भौतिक मात्रा के सम्बन्ध की व्याख्या करना है। इसलिए मूल रूप से उत्पादन फलन एक इन्जीनियरिंग धारणा मानी जाती है न कि आर्थिक धारणा। इस दृष्टि से कुछ लोग उत्पादन फलन को अर्थशास्त्र का विषय मानने से इन्कार करते हैं, क्योंकि उत्पादन फलन ‘कीमत लागत विश्लेषण’ पर कोई ध्यान नहीं देता।

(2) समय-निरपेक्ष धारणा– उत्पादन फलन एक समय-निरपेक्ष धारणा है अर्थात् उत्पादन फलन का सम्बन्ध एक निश्चित समयावधि से होता है। समय के बदल जाने पर उत्पादन फलन अर्थहीन सिद्ध होता है।

(3) उत्पादन फलन स्थैतिक तकनीक का विषय है– उत्पादन फलन तकनीकी ज्ञान के स्तर को यथास्थिर मान कर चलता है। चूँकि तकनीक के बदल जाने पर उत्पादन की मात्रा (अर्थात् उत्पादन फलन) भी बदल जाती है। इसलिए इस धारणा की व्याख्या तकनीकी ज्ञान के एक पूर्व निश्चित स्तर पर ही की जा सकती है।

4) उत्पादन फलन कीमत निरपेक्ष होता है- उत्पादन फलन का सम्बन्ध केवल उत्पादन की भौतिक मात्रा से होता है, उत्पादन के साधनों तथा उत्पादित वस्तुओं की कीमतों से नहीं। यद्यपि उत्पादन फलन कीमतों से स्वतन्त्र होता है तथापि यह स्मरण रहे, प्रत्येक उत्पादनकर्ता उत्पादन स्तर का निर्धारण तथा साधन संयोग चुनाव करते समय वस्तु तथा साधनों की कीमतों को अवश्य ध्यान में रखता है।

(5) उत्पादन फलन साधनों की प्रतिस्थापन सम्भावनाओं को स्वीकार करता है-  उत्पादन फलन की धारणा यह स्वीकार करती है कि उत्पादन के साधनों का परस्पर प्रतिस्थापन करना सम्भव है अर्थात् किसी एक साधन विशेष के स्थान पर किसी दूसरे साधन का प्रयोग किया जा सकता है।

(6) उत्पादन फलन स्थैतिक अर्थशास्त्र का विषय है– चूँकि उत्पादन फलन का सिद्धान्त तकनीकी ज्ञान के स्तर, साधनों की कीमतें तथा समयावधि को निश्चित मानकर चलता है। इसीलिए यह धारणा विशुद्ध रूप से स्थैतिक अर्थशास्त्र का विषय है न कि प्रावैगिक अर्थशास्त्र का।

उत्पादन फलन को प्रभावित करने वाले तत्व उत्पादन फलन को प्रभावित करने वाले तत्व निम्नलिखित हैं-

(1) पूँजी की सीमितता– उत्पादन की मात्रा में वृद्धि करने के लिए जब भी कोई तकनीकी परिवर्तन किया जाता है तो ऐसी स्थिति में अधिक मात्रा में पूँजी की आवश्यकता होती है, किन्तु पूँजी के अभाव में नवीन तकनीक का प्रयोग सम्भव नहीं हो पाता। इसलिए अन्य उत्पादकों की तुलना में अधिक उत्पादन नहीं हो पाता।

(2) तकनीकी ज्ञान एवं विशिष्टीकरण- जब किसी उत्पादक के पास तकनीकी ज्ञान का अभाव होता है एवं उत्पादन में विशिष्टीकरण को प्रोत्साहन नहीं मिलता है तो उत्पादन फलन प्रभावित होता है

(3) संगठनात्मक योग्यता– जब भी उत्पादन की मात्रा में वृद्धि की जाती है तो उसके फलस्वरूप संगठन का आकार भी बढ़ जाता है। इस बड़े संगठन को संचालित करने के लिए पर्याप्त योग्यता की आवश्यकता होती है; अत: स्पष्ट है कि उत्पादन फलन संगठनात्मक योग्यता पर भी काफी सीमा तक निर्भर करता है।

(4) क्रमागत उत्पत्ति ह्रास नियम लागू होना- उत्पत्ति के सभी क्षेत्रों में क्रमागत उत्पत्ति ह्रास नियम लागू होता है, इसलिए उत्पत्ति के साधनों की मात्रा एवं उत्पादन की पारस्परिक निर्भरता लागू होती है।

(5) बाजार का क्षेत्र- यदि किसी उत्पादक का बाजार व्यापक है तो वह उत्पादन के साधनों का अनुकूलतम उपयोग आसानी से कर सकता है। इसके विपरीत यदि किसी उत्पादक का बाजार सीमित है तो वह उत्पादन के साधनों का अनुकूलतम उपयोग नहीं कर सकता है। इस प्रकार स्पष्ट है कि बाजार का क्षेत्र भी उत्पादन फलन को प्रभावित करता है।

 

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Part – 2

समष्टि अर्थशास्त्र एक परिचय

Chepter – 1

परीचय

प्रश्न 1. समधि अर्थशास्त्र की एक उपयुक्त परिभाषा दीजिए।

अथवा

वृहत् अर्थशास्त्र से क्या आशय है?

उत्तर- प्रो, बोलिाग के अनुसार, “समष्टि या व्यापक अर्थशास्त्र में व्यक्तिगत मात्राओं का अध्ययन नही किया जाता है बल्कि इन मात्राओं के योग का अध्ययन किया जाता है। इसका सम्बन्ध व्यक्तिगत आय से नहीं बल्कि राष्ट्रीय आय से होता है, व्यक्तिगत कीमतों में नहीं बल्कि सामान्य कीमत स्तर से होता है, व्यक्तिगत उत्पादन से नहीं बल्कि राष्ट्रीय उत्पादन से होता है।”

प्रश्न 2, “व्यष्टि अर्थशास्त्र का मुख्य यन्त्र कीमत सिद्धान्त है।” स्पष्ट कीजिए।

उत्तर– व्यष्टि अर्थशास्त्र का मुख्य विषय यह है कि किसी वस्तु विशेष की कीमत या उत्पादन के किसी साधन की कीमत कैसे निर्धारित होती है। यही कारण है कि व्यष्टि अर्थशास्त्र को कीमत सिद्धान्त भी कहते हैं। प्रो. शुल्ज के अनुसार, “व्यष्टि अर्थशास्त्र का मुख्य यन्त्र कीमत सिद्धान्त है।”

प्रश्न 3. “व्यष्टि अर्थशास्त्र सरकार की आर्थिक नीति के निर्माण में सहायक है।” इस कथन  को स्पष्ट कीजिए।

उत्तर-  व्यष्टि अर्थशास्त्र का महत्त्व आर्थिक नीतियों के निर्धारण में है। इसमें सरकार की आर्थिक नीतियों का अध्ययन इस दृष्टि से किया जाता है कि उनका व्यक्तिगत या विशिष्ट इकाइयों के कार्यकरण पर कैसे प्रभाव पड़ता है। सदाहरण के लिए, हम इस बात का अध्ययन कर सकते है कि सरकार की नीतियों का विशिष्ट वस्तुओं की कीमतों तथा मजदूरी पर क्या प्रभाव पड़ता है और सरकार की नीतियाँ साधनों के वितरण को किस प्रकार प्रभावित करती हैं।

प्रश्न 4. व्यष्टि अर्थशास्त्र और समष्टि अर्थशास्त्र में क्या अन्तर है?

उत्तर- व्यष्टि (सूक्ष्म) व समष्टि (व्यापक) अर्थशास्त्र में अन्तर-

(1) व्यष्टि अर्थशास्त्र अर्थव्यवस्था के एक छोटे अंश का अध्ययन करता है। जबकि  समष्टि अर्थशास्त्र सम्पूर्ण आर्थिक प्रणाली का अध्ययन करता है।

(2) व्यष्टि अर्थशास्त्र में धातुओं की कीमत उत्पादन   के साधनों की कीमत आदि का अध्ययन किया जाता है। जबकि  समष्टि अर्थशास्त्र में कुल रोजगार, कुल निवेश,राष्ट्रीय आय, कुल उत्पादन आदि का अध्ययन किया  जाता है।

3.व्यष्टि अर्थशास्त्र में योग को टुकड़ों में विभाजित  करने की क्रिया सम्पन्न होती है। जबकि समष्टि अर्थशास्त्र का आधार ‘योग करने की क्रिया’ है।

4. सूक्ष्म अर्थशास्त्र का प्रमुख विषय ‘कीमत  सिद्धान्त’ का विश्लेषण करना है। जबकि समष्टि अर्थशास्त्र का प्रमुख विषय ‘राष्ट्रीय आय व रोजगार’ का विश्लेषण करना है।

5. व्यष्टि अर्थशास्त्र व्यक्तिगत फर्मों, उद्योगों व  उत्पादन की इकाइयों में उतार-चढ़ाव की व्याख्या करता है। जबकि समष्टि अर्थशास्त्र सम्पूर्ण अर्थव्यवस्था के उतार-चढ़ाव, आर्थिक मन्दी, अवसाद या आर्थिक तेजी की व्याख्या करता है।

6.सूक्ष्म अर्थशास्त्र का क्षेत्र सीमित है। सूक्ष्म अर्थशास्त्र ‘सीमान्त विश्लेषण’ के नियम पर आधारित है। जबकि  व्यापक अर्थशास्त्र के अध्ययन का क्षेत्र बहुत विस्तृत है। यह सम्पूर्ण आर्थिक क्रियाओं का अध्ययन करता है।

7. ‘व्यष्टि’ शब्द ग्रीक शब्द ‘Mikros’ से व्युत्पन्न है जिसका अर्थ है ‘छोटा’।  जबकि ‘समष्टि’ शब्द ग्रीक शब्द ‘Makros’ से व्युत्पन्न है जिसका अर्थ है ‘बड़ा’।

प्रश्न 5. समष्टि अर्थशास्त्र के महत्त्व के किन्हीं पाँच बिन्दुओं को स्पष्ट कीजिए।

अथवा

व्यापक अर्थशास्त्र के महत्त्व को स्पष्ट कीजिए।

उत्तर- सन् 1929 की विश्वव्यापी मन्दी के बाद से समष्टि आर्थिक विश्लेषण का महत्त्व सैद्धान्तिक व व्यावहारिक दृष्टि से अत्यधिक बढ़ गया है। इसके महत्त्व व उपभोग को प्रतिपादित करते हुए प्रो. बोल्डिंग ने स्पष्ट किया कि अर्थशास्त्र की नीतियाँ और सम्बन्ध किसी व्यक्ति विशेष एवं वस्तु विशेष से न होकर समूहों से होता है। इसके महत्त्व को निम्नलिखित शीर्षकों के अन्तर्गत समझा जा सकता है-

(1) अर्थव्यवस्था की कार्य- प्रणाली को समझने में सहायक-अर्थव्यवस्था की क्रियाशीलता की समझने के लिए समष्टिगत आर्थिक चरों का अध्ययन आवश्यक होता है, क्योंकि व्यष्टिगत आर्थिक चर आर्थिक प्रणाली के छोटे-छोटे अंगों का व्यवहार चित्रित करते हैं, परन्तु अधिकांश देशों की समस्याएँ कुल उत्पादन, कुल रोजगार, सामान्य मूल्य स्तर तथा भुगतान सन्तुलन से सम्बन्धित होती हैं जिनकी कार्य प्रणाली को समष्टि आर्थिक विश्लेषण के अभाव में समझना असम्भव है।

(2) सूक्ष्म अर्थशास्त्र के विकास में सहायक- अधिकांशत: बहुत कम सूक्ष्मभावी समस्याएँ ऐसी होती हैं जिनका समष्टिगत पहलू नहीं होता। अत: व्यक्तिगत समस्याओं के विश्लेषण हेतु वृहत् अर्थशास्त्र का अध्ययन करना अनिवार्य है; जैसे-किसी विशेष उद्योग (इस्पात) में मजदूरी का निर्धारण अर्थव्यवस्था में प्रचलित सामान्य मजदूरी स्तर से ही प्रभावित होता है। इस प्रकार वृहत् आर्थिक विश्लेषण की सहायता से ही सूक्ष्म अर्थशास्त्र  का विकास सम्भव है।

(3) आर्थिक नीति के निर्धारण में सहायक-आजकल सरकार सभी प्रकार की अर्थव्यवस्था में उपयुक्त नीतियाँ निर्धारित करने के लिए उपाय अपनाती है। सरकार द्वारा अपनायी गयी नीतियों का सम्बन्ध व्यक्तिगत इकाइयों से न होकर समूहगत इकाइयों से होता है।

(4) विकास नियोजन में सहायक-‘ विकास नियोजन’ वर्तमान युग की सर्वाधिक उपयोगी पद्धति है। अल्प विकसित देशों के आर्थिक पिछड़ेपन को दूर करने के लिए तो विकास नियोजन की अत्यधिक आवश्यकता है। समष्टिगत धारणाओं के आधार पर ही नियोजन अधिकारी देश के वर्तमान एवं सम्भाव्य साधनों के सम्बन्ध में महत्त्वपूर्ण तथ्य एकत्र करता है तथा उन साधनों का विभिन्न प्रयोगों के बीच वितरण करता है। विकास परियोजनाओं का मूल्यांकन भी समष्टिमूलक ही होता है।

(5) मौद्रिक समस्याओं का विश्लेषण-समष्टि अर्थशास्त्र की सहायता द्वारा मौद्रिक समस्याओं का विश्लेषण एवं उनका समाधान किया जा सकता है। अर्थव्यवस्था में मुद्रा के मूल्यों में होने वाले परिवर्तनों से समाज के विभिन्न वर्गों को बचाने के लिए उपयुक्त मौद्रिक एवं प्रशुल्क नीति अपनाना अति आवश्यक होता है। सरकार मौद्रिक नीति की प्रभावशीलता भी समष्टि विश्लेषण द्वारा ज्ञात कर सकती है।

(6) अनेक समस्याओं का समाधान समष्टिगत विश्लेषण द्वारा ही समय विदेशी विनिमय, राजस्व बैंकिंग, मला आदि ये साबित कि समस्याओं का समाधान पला अर्थशास्त्र द्वारा समय नहीं है। इन समस्याओं  का समाधान समष्टि अर्थशास्त्र द्वारा ही सम्भव है।

 

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Chapter – 2

 राष्ट्रीय आय का लेखांकन

प्रश्न 1.स्टॉक का क्या अर्थ है ?

उत्तर– स्टॉक एक ऐसा चर है जिसकी मात्रा को निश्चित समय-बिन्दु (Point of time) पर मापा जा सकता है। स्टॉक का समय की मात्रा से कोई सम्बन्ध नहीं होता, अपितु समय के विशेष बिन्दु से होता है। यह एक  स्थिर अवधारणा है। धन, पूँजी, सम्पत्ति आदि स्टॉक हैं।

प्रश्न 2. प्रवाह से क्या आशय है?

उत्तर-  प्रवाह का सम्बन्ध समय-काल (Period of Time) से है अर्थात् प्रवाह वह मात्रा है जिसे विशेष समयावधि में मापा जाता है। आय एक प्रवाह अवधारणा है, क्योंकि इसका सम्बन्ध एक समय काल से है; जैसे- -एक मास, एक वर्ष आदि। व्यय, बचत, पूँजी निर्माण, पूँजी एस, ब्याज मुद्रा की पूर्ति में परिवर्तन आदि प्रवाह के उदाहरण हैं।

प्रश्न 3. राष्ट्रीय आय को परिभाषित कीजिए।

उत्तर– एक देश की राष्ट्रीय आय से आशय साधारणत: एक वर्ष में उत्पादित समस्त वस्तुओ तथा सेवाओं के मूल्य का योग होता है, जिसमें से वस्तुओं तथा सेवाओं के उत्पादन हेतु प्रयोग की गयी मशीनों एवं पूंजी की घिसावट ( या झस) को घटा दिया जाता है तथा विदेशों से प्राप्त शुद्ध साधन आय को जोड़ दिया जाता है।

प्रश्न 4. सकल राष्ट्रीय उत्पाद का अर्थ लिखिए।

उत्तर- सकल राष्ट्रीय उत्पाद (GNP) एक व्यापक अवधारणा है। यदि सकल घरेलू उत्पाद में विदेशों में प्राप्त शुद्ध साधन आय को जोड़ दिया जाये तो सकल राष्ट्रीय उत्पाद प्राप्त हो जाता है।सकल राष्ट्रीय उत्पाद (GNP) =  सकल घरेलू उत्पाद (GDP) + विदेशों से प्राप्त शुद्ध साधन आय (NFIAN)

 प्रश्न 5. शुद्ध घरेलू उत्पाद (NDP) से क्या आशय है

शुद्ध घरेलू उत्पाद के मूल्य में से घिसावट व्यय या पूँजी मूल्य हास को घटाने के पश्चात् जो राशि शेष बचती है उसे शुद्ध घरेलू उत्पाद (NDP) कहते हैं।

शुद्ध घरेलू उत्पाद (NDP)=  सकल घरेलू उत्पाद (GDP)- मूल्य हास

प्रश्न 6. सकल घरेलू उत्पाद से क्या आशय है?

उत्तर– किसी राष्ट्र में एक निश्चित समयावधि में जिन अन्तिम वस्तुओं का उत्पादन किया जाता है, उनके मौद्रिक मूल्य को सकल घरेलू उत्पाद कहते हैं। वे वस्तुएँ एवं सेवाएँ उपभोक्ता तथा पूंजीगत दोनों प्रकार की हो सकती है।

प्रश्न 7. राष्ट्रीय आय लेखांकन की पाँच विशेषताएँ लिखिए।

उत्तर- राष्ट्रीय आय लेखांकन की विशेषताएँ-राष्ट्रीय आय लेखांकन की प्रमुख विशेषताएँ निम्नांकित प्रकार हैं-

(1) राष्ट्रीय आय लेखांकन राष्ट्रीय लेखा तैयार करने की विधि है जो दोहरी लेखा पद्धति पर आधारित है।

(2) इस उद्देश्य के लिए समस्त आर्थिक क्रियाकलापों को दो भागों में बाँटा जाता है-उत्पादक व अनुत्पादक। राष्ट्रीय लेखों में केवल उत्पादक गतिविधियों को ही सम्मिलित किया जाता है, अनुत्पादक गतिविधियों को नहीं।

(3) इस प्रक्रिया में कुल राष्ट्रीय उत्पाद, कुल साधन आय और कुल अन्तिम व्यय के विस्तृत आँकड़े तैयार किये जाते हैं।

(4) उत्पादक क्रियाओं का समूहों तथा क्षेत्रों में कार्यात्मक वर्गीकरण किया जाता है।

(5) विभिन्न क्षेत्रों में कार्यों के आधार पर अन्तर्सम्बन्ध स्थापित किये जाते हैं।

प्रश्न 8, मध्यवर्ती उपभोग की माँग क्या है?

उत्तर – मध्यवर्ती उपभोग की माँग-किसी वस्तु का उत्पादन करने के लिए हमें अर्थव्यवस्था की विभिन्न उत्पादन इकाइयों, जैसे-निगमित और अर्द्ध निगमित उद्यमों, सरकार व गृहस्थों को उत्पादन के लिए विभिन्न आगतों (साधन आगतों तथा गैर साधन आगतों) की माँग करते हैं। इसी माँग को मध्यवर्ती उपभोग की माँग कहते हैं। अर्थात् उद्यमों द्वारा उत्पादन के लिए विभिन्न आगतों के उपभोग को मध्यवर्ती उपभोग कहते हैं। मध्यवर्ती उपभोग के अभाव में किसी वस्तु या सेवा का उत्पादन सम्भव नहीं है। उदाहरण के लिए, किसान तब तक अनाज का उत्पादन नहीं कर सकता जब तक वह अनाज उत्पादन के लिए उर्वरकों, बीजों, कीटनाशक दवाइयों का उपयोग नहीं करता है। ये समस्त उपभोग मध्यवर्ती उपभोग कहलाते हैं। इसी प्रकार कपड़ा मिल कपास, रंग, डीजल आदि की माँग करती है। कपास, रंग तथा डीजल आदि का क्रय मध्यवर्ती माँग कहलायेगी।

प्रश्न 9. व्यय गणना प्रणाली में अन्तिम व्यय के घटक क्या होते हैं ?

उत्तर– व्यय गणना प्रणाली में अन्तिम व्यय के घटक-अन्तिम व्यय के घटक निम्नलिखित हैं-

(1) निजी अन्तिम उपभोग व्यय- इसमें टिकाऊ उपभोक्ता वस्तुएँ, अर्द्ध-टिकाऊ वस्तुएँ तथा गैर-टिकाऊ वस्तुएँ आदि को सम्मिलित किया जाता है। इसके अलावा गृहस्थों द्वारा शिक्षण, परिवहन, बीमा, टेलीफोन आदि सेवाओं पर भी व्यय किया जाता है।

(2) सरकारी अन्तिम उपभोग व्यय- सरकार उपभोग व्यय में कर्मचारियों का पारिश्रमिक, फर्मों तथा विदेशों से खरीदी जाने वाली वस्तुओं का मूल्य शामिल किया जाता है। हस्तान्तरण भुगतानों को सरकारी व्यय में शामिल नहीं करना चाहिए, क्योंकि हस्तान्तरण भुगतान उत्पादन प्रक्रिया में शामिल नहीं होते।

(3) सकल स्थिर पूँजी निर्माण- सरकार निजी उद्यमों की तरह पूँजीगत परिसम्पत्तियों; जैसे-सड़क, पुल, बाँध निर्माण, परिवहन उपकरण, विद्युत् परियोजनाओं आदि के निर्माण पर व्यय करती है। इन पर किया गया व्यय सरकारी निवेश होता है।

(4) स्टॉक परिवर्तन-  स्टॉक परिवर्तन से आशय अर्थव्यवस्था में कच्चा माल, अर्द्ध-निर्मित माल और निर्मित माल में वृद्धि करना है। वित्तीय वर्ष के प्रारम्भ में कितना स्टॉक था तथा वित्तीय वर्ष के अन्त में जितना स्टॉक है, उसका अन्तर ही स्टॉक परिवर्तन कहलाता है।

(5) वस्तुओं एवं सेवाओं का शुद्ध निर्यात- एक लेखा वर्ष में एक राष्ट्र के निर्यातों और आयातों के अन्तर को शुद्ध निर्यात कहते हैं। वस्तुओं एवं सेवाओं का शुद्ध निर्यात भी सकल घरेलू उत्पाद का ही अंग है।

प्रश्न 22. राष्ट्रीय आय में दोहरी गणना की समस्या क्या है ? उसका समाधान कैसे किया जायेगा?

अथवा

दोहरी गणना क्या होती है ? उदाहरण द्वारा स्पष्ट कीजिए।

उत्तर- राष्ट्रीय आय की परिगणना करते समय सबसे बड़ी कठिनाई दोहरी गणना की होती है। इसमें एक वस्तु या सेवा को कई बार गिनने की आशंका बनी रहती है। दोहरी गणना न हो इसके लिए यह आवश्यक है कि केवल अन्तिम उपभोक्ता वस्तुओं का मूल्य ही लिया जाये मध्यवर्ती वस्तुओं का नहीं। वास्तव में कच्चे माल तथा अर्द्ध-निर्मित वस्तुओं के सम्बन्ध में तो दोहरी गणना की सम्भावना बहुत ही अधिक रहती है। उदाहरण के लिए, यह एक साधारण-सी गलती है कि कृषि उत्पादन का अनुमान लगाते समय गन्ने तथा कपास की मात्रा को उसमें शामिल कर लिया जाये और औद्योगिक उत्पादन की गणना करते समय इनसे बनायी गयी चीनी और कपड़े को भी सम्मिलित कर लिया जाये। यदि ऐसा हो तो राष्ट्रीय आय कई गुना हो जाती है।

प्रश्न10.  सकल राष्ट्रीय उत्पाद तथा शुद्ध राष्ट्रीय उत्पाद में अंतर बताइए।

उत्तर-  1.  सकल राष्ट्रीय उत्पाद किसी 1 वर्ष में उत्पादित वस्तुओं और सेवाओं के बाजार मूल्य का योग होता है जबकि शुद्ध राष्ट्रीय उत्पाद पूरे वर्ष में उत्पादित वस्तुओं के मूल्य के कुल योग में कुल व्यय घटाने पर प्राप्त मूल्य होता है।

2. सकल राष्ट्रीय उत्पाद प्रत्यक्ष व अप्रत्यक्ष कर एवं संपत्ति का हाथ भी शामिल रहता है जबकि शुद्ध राष्ट्रीय उत्पाद में प्रत्यक्ष व अप्रत्यक्ष कर तथा संपत्तियों का हाथ कम कर दिया जाता है ।

3. सकल राष्ट्रीय उत्पाद में उत्पादित वस्तुओं और सेवाओं की फुल मात्रा का योग होता है जबकि शुद्ध राष्ट्रीय उत्पाद में उत्पादित वस्तुओं और सेवाओं की शुद्ध मात्रा का योग होता है

4.  सकल राष्ट्रीय उत्पाद का वितरण नहीं किया जाता इसका प्रत्यक्ष संबंध आर्थिक एवं कुल कल्याण से नही  होता है जबकि यह उचित शुद्ध राष्ट्रीय उत्पाद उचित प्रकार से उत्पादन के घटकों की वितरित आई है और आर्थिक कल्याण से संबंधित है।

प्रश्न 11. राष्ट्रीय आय तथा प्रति व्यक्ति आय में अन्तर लिखिए।

उत्तर- किसी देश में एक वर्ष में उत्पादित विभिन्न वस्तुओं एवं सेवाओं के योग को राष्ट्रीय आय कहते हैं। राष्ट्रीय आय को मौद्रिक आय में व्यक्त किया जाता है। इसलिए राष्ट्रीय आय ज्ञात करने के लिए समस्त उत्पादित वस्तुओं एवं सेवाओं के मूल्यों का योग कर दिया जाता है और इस योग से हास की राशि घटा दी जाती है। अन्त में जो राशि प्राप्त होती है वही उस देश की कुल राष्ट्रीय आय कहलाती है। यदि इस राशि के योग में उस देश की कुल जनसंख्या के योग का भाग दे दिया जाये तो उस देश की प्रति व्यक्ति आय ज्ञात हो जायेगी।

प्रश्न 12. राष्ट्रीय आय का महत्त्व समझाइए।

अथवा

राष्ट्रीय आय की गणना के महत्त्व को समझाइए।

उत्तर-  राष्ट्रीय आय को ज्ञात करना अनेक दृष्टिकोणों से महत्त्वपूर्ण है। यही कारण है कि राष्ट्रीय आय वर्तमान समष्टिपरक विश्लेषण की आधारशिला है। संक्षेप में इसका निम्नलिखित महत्त्वपूर्ण योगदान है-

(1) आर्थिक कल्याण की माप– राष्ट्रीय आय की सहायता से किसी देश के आर्थिक कल्याण को मापा जा सकता है। वास्तव में, किसी देश की राष्ट्रीय आय व उसके आर्थिक कल्याण में घनिष्ठ सम्बन्ध है।

डॉ. मार्शल के अनुसार, “अन्य बातें समान रहने पर किसी देश की राष्ट्रीय आय जितनी अधिक होती है, उस देश का आर्थिक कल्याण भी उतना अधिक समझा जाता है।”

(2) सरकार की नीतियों में सहायक- राष्ट्रीय आय विश्लेषण सरकार की प्रशुल्क नीतियों के निर्धारण में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। प्रायः करों का निर्धारण राष्ट्रीय आय के अनुपात में किया जाता है। इसके अतिरिक्त साख, मौद्रिक व रोजगार आदि नीतियों के निर्धारण में भी राष्ट्रीय आय का विश्लेषण लाभदायक होता है।

(3) आर्थिक विकास का मापदण्ड- राष्ट्रीय आय के द्वारा हमें यह ज्ञात हो जाता है कि किसी देश का आर्थिक विकास हो रहा है अथवा नहीं। अन्य सभी बातें समान रहते हुए जब किसी देश की आय में वृद्धि होती है, तब यह माना जाता है कि उस देश की आर्थिक स्थिति सुदृढ़ हो रही है।

(4) आर्थिक उन्नति का तुलनात्मक अध्ययन– इससे यह पता लगाया जा सकता है कि विभिन्न देशों में कृषि, उद्योग, व्यापार आदि से कितनी आय प्राप्त होती है। ऐसा करने से किसी देश की अन्य देशों में विभिन्न क्षेत्रों में होने वाली प्रगति का अनुमान लगाया जा सकता है।

(5) आय के वितरण का अनुमान- राष्ट्रीय आय की गणना से समाज के विभिन्न वर्गों में आय के वितरण का भी ज्ञान हो जाता है। इस प्रकार आय की असमानता को दूर करने के लिए आवश्यक प्रयास किये जा सकते हैं।

प्रश्न 13. भारत की राष्ट्रीय आय कम होने के प्रमुख कारण बताइए।

अथवा

भारत में राष्ट्रीय आय की धीमी वृद्धि के प्रमुख कारणों का वर्णन कीजिए।

उत्तर-  भारत में राष्ट्रीय आय की वृद्धि दर कम होने के प्रमुख कारण निम्नलिखित हैं-

(1) जनसंख्या वृद्धि- जनसंख्या वृद्धि राष्ट्रीय आय तथा प्रति व्यक्ति आय में वृद्धि की धीमी गति का सबसे महत्त्वपूर्ण कारण है। भारत में 1951 में केवल 23-84 करोड़ जनसंख्या थी जो 2011 में बढ़कर 121-02 करोड़ हो गयी। इतनी तीव्र गति से बढ़ती जनसंख्या सरकार द्वारा बनाये गये आर्थिक विकास के कार्यक्रमों में बाधा पहुँचाती है।

(2) कृषि उत्पादन की अनिश्चितता- भारत की राष्ट्रीय आय में कृषि का महत्त्वपूर्ण योगदान है, किन्तु कृषि आज भी मानसून पर निर्भर है, जिसका व्यवहार अनिश्चित है। इसके अतिरिक्त प्राकृतिक विपदाएँ-बाढ़, फसलों की बीमारियों आदि कृषि क्षेत्र में निम्न उत्पादन के लिए जिम्मेदार हैं।

(3) कुशल श्रमिकों का अभाव– भारत में कुशल श्रमिकों के अभाव से भी विकास अवरुद्ध होता है। प्रत्येक उद्योग अपने उपक्रमों के संचालन के लिए विशिष्ट रूप से कुशल व्यक्तियों की माँग करता है जिसका यहाँ अत्यन्त अभाव पाया जाता है। है जिससे भारत की अर्थव्यवस्था आज भी बैलगाड़ी अर्थव्यवस्था के समान ही है।

(4) पिछड़ी तकनीक– भारत में तकनीकी पिछड़ापन कृषि क्षेत्र तथा औद्योगिक क्षेत्र दोनों में ही विद्यमान है जससे भारत की अर्थव्यवस्था आज भी बैलगाड़ी अर्थव्यवस्था के समान ही है।

(5) बचत एवं निवेश की निम्न दर- राष्ट्रीय आय की राशि मुख्यत: बचत एवं निवेश की दर पर निर्भर करती है। भारत में बचत और निवेश की दर कम है जिससे राष्ट्रीय आय भी कम है।

(6) विशिष्ट वित्तीय संस्थाओं का अभाव- भारत में वित्तीय संस्थाओं के अपूर्ण विकास ने भी आर्थिक विकास की गति को अवरुद्ध किया है। यद्यपि सरकार ने स्वतन्त्रता प्राप्ति के पश्चात् कृषि एवं औद्योगिक वित्त की व्यवस्था के लिए कुछ विशिष्ट संस्थाओं की स्थापना की है, लेकिन राष्ट्र की आवश्यकता को देखते हुए ये बहुत अपर्याप्त हैं।

(7) सामाजिक कारण-भारत की कतिपय सामाजिक संस्थाएँ (जाति प्रथा एवं संयुक्त परिवार प्रणाली) राष्ट्रीय आय पर विपरीत प्रभाव डालती है। दूसरी ओर भारत में लोगों की अशिक्षा एवं अज्ञानता बड़ी मात्रा में देश के पिछड़ेपन के लिए उत्तरदायी हैं।

(8) राजनीतिक कारण- हमारे देश में राजनीतिक अस्थिरता एवं प्रेरणा का अभाव, दो ऐसे कारण हैं जिससे राष्ट्र के आर्थिक विकास के कार्यक्रमों को उचित गति नहीं मिल पा रही है। इस कारण राष्ट्रीय आय की वृद्धिदर धीमी रही है।

Chapter – 3
मुद्रा और बैंकिंग

प्रश्न 1-  वस्तु विनिमय क्या है?

उत्तर- वस्तु विनिमय के अन्तर्गत वस्तु के बदले वस्तु या सेवा का विनिमय किया जाता है। उदाहरण के लिए, यदि किसी गाँव में बढ़ई या लुहार की सेवाओं के बदले उसे एक क्विटल गेहूँ दिया जाये तो वह वस्तु विनिमय है।

प्रश्न 2. सांकेतिक मुद्रा से क्या आशय है ?

अथवा

सांकेतिक सिक्का किसे कहते हैं?

उत्तर-  सांकेतिक मुद्रा-इसे प्रतीक मुद्रा भी कहा जाता है। प्रतीक सिक्के का मूल्य उसके धात्विक मूल्य से अधिक होता है। इन सिक्कों का मूल्य सरकार निश्चित करती है। यह सहायक मुद्रा के रूप में प्रयुक्त किया जाता है। इसका भुगतान निश्चित मात्रा तक ही किया जा सकता है। सांकेतिक सिक्कों की ढलाई सीमित होती है तथा इनके चलन पर सरकार का नियन्त्रण होता है।

प्रश्न 3. मुदा साख-मुद्रा का आधार है, क्यों?

उत्तर-व्यापार, उद्योग एवं वाणिज्य के बढ़ते हुए महत्त्व के कारण साख-मुद्रा का चलन बढ़ता जा रहा है। चेक, विनिमय विपत्र, प्रतिज्ञा-पत्र, हुण्डो, यात्री चेक आदि का व्यापक रूप से प्रयोग किया जा रहा है। असमान में बैंक भी साख मुद्रा का निर्माण करते हैं, परन्तु मुद्रा के बिना ऐसा कर पाना सम्भव नहीं है। इस प्रकार मुदा साख-मुदा का आधार है।

प्रश्न 4. भारत के किन्हीं छः राष्ट्रीयकृत बैंकों के नाम लिखिए।

उत्तर- (1) पंजाब नेशनल बैंक, (2) इलाहाबाद बैंक, (3) बैंक ऑफ बड़ौदा,(4) केनरा बैंक, (5) स्टेट बैंक (6) सिण्डीकेट बैंक।

प्रश्न 5. अधिविकर्ष (Overdraft) क्या है ?

उत्तर–  अधिविकर्ष-बैंक में चालू जमा खाता रखने वाले ग्राहक बैंक से एक समझौते के अनुसार अपनी जमा से अधिक रकम निकलवाने की अनुमति ले लेते हैं। निकाली गई रकम को अधिविकर्ष  (Overdraft) कहते हैं। यह सुविधा अल्पकाल के लिए विश्वसनीय ग्राहकों को ही मिलती है।

प्रश्न 6. बैंकों के सामान्य उपयोगिता सम्बन्धी कार्य बताइए।

उत्तर- बैंकों के सामान्य उपयोगिता सम्बन्धी कार्य-आधुनिक युग में बैंकों द्वारा अनेक ऐसे कार्य किये जाते हैं जिनका सम्बन्ध सामान्य उपयोगिता से होता है। ऐसे कुछ प्रमुख कार्य निम्नलिखित हैं-

(1) बहुमूल्य धातुओं, प्रतिभूतियों एवं पत्रों को लॉकर में सुरक्षित रखना,

(2) साख प्रमाण-पत्र जारी करना,

(3) ग्राहकों की ओर से विनिमय बिल स्वीकार करना,

(4) ग्राहकों की आर्थिक स्थिति के सम्बन्ध में सूचना देना,

(5) ऋणपत्रों तथा अंशों का अभिगोपन करना,

(6) व्यवसाय सम्बन्धी आँकड़े एवं सूचनाएँ एकत्र करना आदि।

प्रश्न 7. क्या आप ऐसा मानते हैं कि अर्थव्यवस्था में व्यावसायिक बैंक ही ‘मुद्रा का निर्माण करते हैं?

उत्तर– बैंक जमाएँ (Bank deposits) आजकल मुद्रा का प्रधान रूप मानी जाती हैं। यदि केन्द्रीय बैंक मुद्रा पूर्ति को नियन्त्रित करना चाहे तो इसे बैंक मुद्रा को ही नियन्त्रित करना पड़ेगा। बैंकों द्वारा मुद्रा निर्मित करने की क्रिया को साख-निर्माण कहते हैं।

व्यावसायिक बैंक अर्थव्यवस्था में मुद्रा की पूर्ति का एक महत्त्वपूर्ण स्रोत है। वे अपने दिए गए ऋणों से सम्बन्धित माँग-जमाओं के रूप में साख का सृजन करते हैं। व्यावसायिक बैंकों की माँग जमाएँ उनके नकद कोषों से कई गुना अधिक होती है। उदाहरण के लिए, मान लिया कि उनके नकद कोषों की राशि के ₹ 10,000 हैं तथा माँग जमाएँ ₹ 1,00,000 है, तो अर्थव्यवस्था में मुद्रा की पूर्ति व्यावसायिक बैंकों के नकद कोष से दस/गुना अधिक हो जाएगी। इसी प्रकार नकद कोष के ₹ 10,000 के आधार पर व्यावसायिक बैंकों ने मुद्रा की पूर्ति में ₹ 1,00,000 का योगदान किया।

प्रश्न 8. भारतीय रिजर्व बैंक की किस भूमिका को अन्तिम ऋणदाता कहा जाता है ? 

अथवा

केन्द्रीय बैंक को अन्तिम ऋणदाता क्यों कहा जाता है ?

उत्तर- अन्तिम ऋणदाता-जब साधारण वाणिज्य बैंकों को आपत्ति के समय कहीं और से ऋण नहीं मिलता तब उन्हें अन्त में केन्द्रीय बैंक से वित्तीय सहायता मिलती है। इसलिए केन्द्रीय बैंक को अन्तिम ऋणदाता कहा जाता है।

अन्तिम ऋणदाता के रूप में केन्द्रीय बैंक अन्य वाणिज्य बैंकों को तीन प्रकार से ऋण देता है-

(1) केन्द्रीय बैंक व्यापारिक बिलों की पुनर्कटौती (Rediscounting) करके बैंक दर पर वाणिज्य बैंकको स्पष्ट रूप (Front door) से अल्पकालीन ऋण देता है। बिलों की अवधि पूरी होने से पहले ही जब बैंको को नकदी की आवश्यकता पड़ती है तो वे इन बिलों की पुनर्कटौती कराके केन्द्रीय बैंक से अल्पकालीन ऋण प्राप्त कर लेते हैं।

(2) प्रथम श्रेणी की प्रतिभूतियों को धरोहर के रूप में रखकर भी वाणिज्य बैंक इस बैंक से ऋण प्राप्त करते हैं।

(3) कभी-कभी केन्द्रीय बैंक बिलों की पुनर्कटौती बैंक दर पर न करके बाजार ब्याज दर (Market interest rate) पर करता है तो यह कहा जाता है कि वाणिज्य बैंक को केन्द्रीय बैंक ने अल्पकालीन ऋण पीछे के दरवाजे (Back door) से दिया है।

प्रश्न 9. भारत में बैंकों का महत्त्व समझाइए। (कोई पांच)

उत्तर-                   भारत में बैंकों का महत्त्व

आधुनिक अर्थव्यवस्था के विकास में बैंकों की भूमिका महत्त्वपूर्ण है। बैंक व्यापारिक, औद्योगिक, कृषिआदि के विकास के लिए ऋण प्रदान करते हैं जिससे देश का विकास होता है। बैंकों से होने वाले निम्नलिखित लाभ हैं-

(1) उद्योग तथा व्यापार के लिए साख व्यवस्था– ये जनता द्वारा बचत को एकत्रित करके पूँजी जमा करते हैं तथा व्यापारियों और उद्योगपतियों को साख प्रदान करते हैं। उनके रुपये का हस्तान्तरण, विनिमय विपत्र, हुण्डी का भुगतान के रूप में करते हैं।

(2) पूँजी निर्माण में सहायक- बैंक जनता से जमा प्राप्त करके बचत को प्रोत्साहन देते हैं। जनता की छोटी-छोटी बचतों से देश में पूँजी निर्माण होता है जो कि आर्थिक उन्नति का आधार है।

(3) पूँजी हस्तान्तरण की सुविधा–  बैंक पूँजी को एक स्थान से दूसरे स्थान पर सरल, सस्ती और आसान ढंग से भेजने हेतु ड्राफ्ट, चेक आदि की व्यवस्था करते हैं।

(4) साख पत्रों का संग्रह-  बैंक अपने ग्राहकों द्वारा जमा किये गये चेक, बिल, हुण्डी, ड्राफ्ट, विनिमय विपत्र आदि संग्रह करके भुगतान करते हैं।

(5) बहुमूल्य वस्तुओं की सुरक्षा– बैंकों द्वारा लॉकर्स की सुविधा उपलब्ध कराने से ग्राहकों की बहुमूल्य वस्तुएँ सुरक्षित रहती हैं।

(6) अंतरराष्ट्रीय व्यापार में सहायता – व्यापारिक बैंक विदेशी व्यापार के लिए धन की व्यवस्था करते हैं तथा अन्तर्राष्ट्रीय व्यापार को सफल बनाते हैं।

(7) कृषि कार्यों के लिए साख व्यवस्था-कृषि विकास के लिए निर्धन कृषकों को खाद, बीज, यन्त्रों की खरीद के लिए ऋण प्रदान करते हैं।

 

 

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