भारतीय शिक्षा का इतिहास एवं विकास -महत्वपूर्ण प्रश्न 56

त्रिभाषा सूत्र से आप क्या समझते हैं ? स्पष्ट कीजिए।

उत्तर – शिक्षा के क्षेत्र में भाषा का विशेष महत्व है। भारत जैसे बहुभाषी देश में भाषा के अध्ययन तथा शिक्षा के माध्यम के रूप में भाषा की समस्या सदैव से रही है। भाषा-समस्या के विवेचन के संदर्भ में त्रिभाषा सूत्र एक महत्वपूर्ण सुझाव माना जाता है। इस सूत्र को सर्वप्रथम 26 जनवरी, 1956 ई° में केंद्रीय शिक्षा सलाहकार बोर्ड ने प्रस्तुत किया था। इसका मुख्य उद्देश्य भाषा संबंधित विवाद को समाप्त करना था। इस सूत्र अथवा भाषा संबंधित सिद्धांतों के अंतर्गत सुझाव दिया गया था कि माध्यमिक स्तर पर सभी छात्रों को 3 भाषाओं का अध्ययन करना चाहिए। इस सिद्धांत के अंतर्गत 3 भाषाओं की जो व्यवस्था की गई थी वह निम्नवर्णित है।

  • (1) मातृभाषा या क्षेत्रीय भाषा,
  • (2) अंग्रेजी या अन्य आधुनिक भाषा,
  • (3) गैर-हिंदी भाषी क्षेत्रों के लिए हिंदी भाषा तथा हिंदी भाषी क्षेत्रों के लिए कोई अन्य भारतीय भाषा।
  • इसके बाद ‘कोठारी आयोग’ नेट ‘त्रिभाषा सूत्र’ को पुनः कुछ संशोधित रूप से प्रस्तुत किया कोठारी आयोग ने हिंदी को राजभाषा के रूप में मान्यता तो प्रदान कर दी, परंतु इसके साथ-साथ यह भी स्पष्ट कर दिया गया कि किसी भी प्रदेश में हिंदी को बरबस थोपा नहीं जाएगा। कोठारी आयोग ने त्रिभाषा सूत्र को अगर लिखित रूप में प्रस्तुत किया
    • (1) प्रथम भाषा के रूप में मातृभाषा या प्रादेशिक भाषा की शिक्षा दी जानी चाहिए।
    • (2) द्वितीय भाषा के रूप में केंद्र की राजभाषा या सहकारी भाषा की शिक्षा दी जानी चाहिए।
    • (3) तीसरी भाषा के रूप में किसी आधुनिक भारतीय भाषा या यूरोपिय भाषा की शिक्षा की व्यवस्था होनी चाहिए जो वर्ग ‘अ’ या ‘ब’ मैं सम्मिलित न हो।
    • इस सिद्धांत के विश्लेषण द्वारा स्पष्ट है कि आयोग ने छात्रों को अंग्रेजी या हिंदी अथवा दोनों ही भाषाओं के अध्ययन की स्वतंत्रता प्रदान की है आयोग ने त्रिभाषा सूत्र ने हिंदी या अंग्रेजी में से एक भाषा का अध्ययन संभव बनाकर हिंदी के कारण त्रिभाषा सिद्धांत के विरोध को समाप्त करने का प्रयास किया।
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